Exaltation and Debilitation

Sun is the King. He feels exalted in the Rashi of pioneering (Aries). The king feels uneasy (debilitated) in the market (Libra) where he needs to negotiate with others.

Moon is the Queen. She feels exalted in the rashi of comfort, rest and acquisition (Taurus). She feels uncomfortable in Scorpio, the rashi of sudden upheavals and secrets.

Mars is the warrior. He feels comfortable in the battlefield (Capricorn). The warrior, ofcourse, feels uncomfortable in the rashi of emotions (Cancer). He just wants to fight.

Exaltation and Debilitation

Mercury represents intellect and communication. He is the only planet exalted in his own Rashi (Virgo) of logic. He feels jarred in the rashi of imagination (Pisces) which cuts across the intellect.

Jupiter, the teacher is exalted in the rashi of nurturing and caretaking (Cancer). The teacher is not at ease in the battlefield (Capricorn).

Venus, the planet of harmony is exalted in the rashi of spirituality (Pisces). Venus, the artist, feels thrown off balance in the rashi of logic (Virgo).

Saturn, the lord of Rules is exalted in the rashi of balance (Libra). Saturn feels uneasy in the rashi of pure bubbling energy (Aries) which does not want to follow any rules.

आराम करो

एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ — है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ — सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब ‘सुख की नींद’ कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

~~~
गोपालप्रसाद व्यास

Humanity

A man
who takes away
another man’s freedom
is a prisoner of hatred,
he is locked behind the bars
of prejudice and narrow-mindedness.

I am
not truly free
if I am taking away
someone else’s freedom,
just as surely as I am not free
when my freedom is taken from me.

The oppressed and the oppressor
alike are robbed of their humanity.

~~~
Nelson Mandela

Naturally

No one is born
hating another person
because of the colour of his skin,
or his background, or his religion.

People must learn to hate,
and if they can learn to hate,
they can be taught to love,
for love comes more naturally
to the human heart than its opposite.

~~~
Nelson Mandela

The Social Structure

Society
must be organized
in such a way that
man’s social, loving nature
is not separated from his social existence, but becomes one with it.

If it is true,
as I have tried to show,
that love is the only sane and satisfactory answer
to the problem of human existence,
then any society which excludes,
relatively,
the development of love,
must in the long run perish
of its own contradiction with the basic necessities of human nature.

~~~
Erich Fromm